हाल ही में मुझे सलाह दी गयी की मैं एक प्रेम कहानी लिखू , प्रेम भारत में theory का विषय रहा है , यहाँ सूफी साहित्यकारों ने प्रेम को अध्यात्म रंग में रंग दिया वे तो प्रेम में भगवान् ढूंढ़ते थे , भगवान् कृष्ण तो स्वयं अध्यात्म रंग में रँगे थे , अंग्रेजी साहित्य के शेली हो या हिंदी साहित्य के बिहारी , घनानंद , सभी ने प्रेम को एक नया रूप दिया .मैं कुछ लिखता इससे पहेले मेरे सामने कहानी के पात्रो के चयन की समस्या आ गयी , मैं लैला-मंजनू , शिरी - फरहाद , रोम्यो - जूलियट जैसी कोई धांसू कहानी लिखना चाहता था , और इसके लिए मुझे ऐसी ही किसी जोड़ी की तलाश थी ,
कई दिन तक मैंने कॉलेज और मोहल्ले में अपनी तलाश जारी रखी , मैं किसी गुप्तचर की तरह गली मोहल्लो में फिरता रहा, मगर यहाँ कहानिया शुरु होने से पहेले ही खत्म हो जाती है , कुछ शोर्ट टाइप की कहानिया बनती है दीवारों पर प्रेम इजहार होता है जिसे आवारा हरकत बता दिया जाता है , उनके नाम अगर में अपनी कहानी में लिख दू तो लगेगा की मैं किसी पुलिस केस की परताल कर रहा हु,
वर्तमान भारत में प्रेम अस्थाई है , यहाँ प्रेम की कुछ नई परिभाषाये विकसित हुई है , सभ्य समाज में "DOSTANA" जैसे विषयों पर चर्चाये आम बात है , वर्तमान भारतीय बड़े प्रैक्टिकल हो गए है अब यहाँ ' लिविंग TOGETHER , 'लिव इन रिलेशनशिप' जैसे माध्यमो से साथ रहेकर यह तय करते है की उनके बीच प्रेम है या नहीं ,
आठवे दर्जे में पढ़ते समय गाव में घर पर बुजुर्गो को रामचरितमानस का पाठ सुनाया करता था , कई प्रसंगों को सुनकर वे भाव विभोर हो जाया करते थे , राम-सीता मिलन प्रसंग पर तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बह जाया करती थी , ऐसा क्यों होता था मैं अब समझ पाया ,
मेरी कहानी के पात्रो की खोज अभी भी जारी थी , एक दिन कॉलेज में बता कुछ लिख रहा था वही एक स्टाइलिश लड़की आकर मेरे पास बेठ गई , "यु आर ओम ऍम आई राईट ?" "जी हा " हाउ आर यु ? FINE , एंड वाट अबाउट यु ? " मैं ठीक हु ,क्या कर रहे थे ?" "जी कुछ खास नहीं कविता लिखने की कोशिश कर रहा था ?" " हाउ स्वीट , आई ऍम कविता , क्या तुम मेरे लिए कुछ लिखोगे ?" प्रश्न बड़ा विकट था , जाहिर सा प्रेम निवेदन था , मुझे लगा की इस प्रेम कहानी का पात्र मैं ही बन रहा हू , लेकिन इस कविता को मैं अच्छी तरह जानता था , इससे पहेले भी कई सहपाठी कविता पर कविता लिख चुके थे , मैंने जिन्दगी के इकलोते प्यार को अस्वीकार कर दिया था ,
कुछ दिन मित्र मण्डली में हंसी का पात्र बना , लेकिन मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं था ,
एक दिन किसी उद्यान में बैठा था , तभी मेरी नजर एक लड़के और एक लड़की पर गई , दोनों एक दूसरे को काफी दूर से निहार रहे थे लड़की सभ्य दिखाई पड़ रही थी , मुझे यकायक राम-सीता का मधुर मिलन याद आ गया , ऐसा लगा की मेरी खोज पूरी हुई , दोनों निकट आये , थोरी देर बात हुई , शायद परिचय हुआ हो? अगले ही पल दोनों उद्यान से निकल चुके थे , दोनों बायक पर सवार हो मेरी नजरो से ओझल हो गए , उनका प्रेम भी परिणित हो चूका था , ये कहानी भी यही समाप्त हो चुकी थी मगर मेरी प्रेम कहानी को पात्रो की दरकार अभी भी है ..................................,